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आदिवासियों में ईसाई धर्म के फैलने के प्रभाव

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मनीषा आमले रिपोर्टर धार

विश्व के हर समाज की अपनी विश्वास प्रणाली है, जो उस समाज की नींव होती है ताकि समाज हर क्षेत्र में प्रगति कर सके। इसमें किसी भी तरह का बदलाव समाज के भीतर विरोध का कारण बन सकता है। उदाहरण के लिए, पूर्वोत्तर भारत विभिन्न आदिवासी समूहों का घर है। जिनके जीवन जीने के अलग - अलग तौर तरीके और विश्वास प्रणाली है। हर आदिवासी समूह की अलग बोली, भाषा, पहचान, आस्था, रीतिरिवाज और परंपराएं है। लेकिन वे शांतिपूर्ण तरीके से मिल - जुलकर रहने और आपसी भाईचारे में विश्वास रखते हैं जो उन्हे एकजुट रखता है। यह लेख तथ्यात्मक बिन्दुओं पर कुछ रोशनी डालता है कि कैसे तथाकथित सुधारवादियों की आड़ में ईसाई मिशनरियों द्वारा संरक्षण के नाम पर अरुणाचल प्रदेश के सबसे पूर्वी भाग (मुख्य रूप से चीन की सीमा से लगे) अंजा और लोहित जिलों में रहने वाले मिश्मी जनजाति के लोगों की आस्था को कमजोर किया हैं । 

   मिश्मी जनजाति के लोग प्रकृति, सूरज और चाँद की पूजा करते हैं । उनके पास अपनी धार्मिक प्रथाओं का समर्थन करने वाली कोई धार्मिक पुस्तक या धार्मिक साहित्य नहीं है। 1990 के दशक में कुछ ईसाई मिशनरियों ने इलाके में विकास के बहाने मासूम मिश्मी लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करना शुरू किया था । ईसाई मिशनरियों ने मिश्मी लोगों से कहा की ईसाई धर्म अपनाने से उनका जीवन खुशियों और सफलता से भर जाएगा। कुछ मासूम मिश्मी लोग धर्म परिवर्तन के लिए राजी हो गए, जिसके कारण वे अपने परिवार और रिश्तेदारों से अलग हो गए। इन धर्मांतरित मिश्मी लोगों ने ईसाई धर्म को बढ़ावा देना शुरू कर दिया और मूल मिश्मी संस्कृति के खिलाफ दुर्भावना दि

राजू एम.सोलंकी प्रदेशाध्यक्ष जय आदिवासी युवा शक्ति(जयस)मध्यप्रदेश

  खाने लगे। अब स्थिति यह है कि कुल आबादी के लगभग 15% ईसाई मिश्मीयों ने मूल मिश्मी लोगों का शांति से रहना मुश्किल कर दिया है। वर्तमान में मिश्मी को दो समूहों में बांटा जा सकता है - ईसाई मिश्मी और मूल मिश्मी। सुधार के नाम पर मिश्मी धीरे - धीरे अपनी पहचान और संस्कृति खोते जा रहे हैं। इसी प्रकार मध्यप्रदेश के आदिवासी बाहुल्य क्षैत्र झाबुआ, अलीराजपुर,बड़वानी, धार में भी भोले भाले भील,भीलाला,बारेला जनजातीय समाज में इसाई मिशनरीज शिक्षा,स्वास्थ्य के नाम पर बरगलाकर धर्मान्तरण का खेल खेल रहे है और जनजाती की मूल संस्कृति, परंपराओ और रीति-रिवाज को खत्म कर रहे है ईसाइयों द्वारा समाज सुधार कुछ हद तक राजनीति से प्रेरित है जो आने वाले समय में समाज और देश के लिए नुकसानदायक साबित होगा। जनजातियों की आस्था और संस्कृति को बढ़ावा देने और बचाने के लिए विभिन्न संगठनों द्वारा प्रयास किए जा रहे हैं। एक सभ्य इंसान के रूप में, प्रत्येक व्यक्ति को हर धर्म और उससे जुड़ी आस्था का सम्मान करना चाहिए । निजी स्वार्थ के लिए किसी की मान्यताओं को धक्का देना नैतिकता के विरुद्ध है जिसे कभी स्वीकारा नहीं जा सकता। इसलिए दुनिया भर के हर समाज को अपने विश्वास और संस्कृति को बचाने और संरक्षित करने की जरूरत है। आखिरकार 'संस्कृति का नुकसान समाज की पहचान का भी नुकसान' है।